ميان ِ خورشيدهاي ِ هميشه
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زيبائيي ِ تو |
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لنگريست ــ |
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خورشيدي که |
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از سپيدهدم ِ همه ستارهگان |
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بينيازم ميکند. | |
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نگاهات |
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شکست ِ ستمگريست ــ |
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نگاهي که عريانيي ِ روح ِ مرا |
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از مِهر |
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جامهئي کرد | |
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بدانسان که کنونام |
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شب ِ بيروزن ِ هرگز |
چنان نمايد که کنايتي طنزآلود بوده است.
و چشمانات با من گفتند
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که فردا |
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روز ِ ديگريست ــ |
آنک چشماني که خميرْمايهي ِ مِهر است!
وينک مِهر ِ تو:
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نبردْافزاري |
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تا با تقدير ِ خويش پنجه در پنجه کنم. |
آفتاب را در فراسوهاي ِ افق پنداشته بودم.
به جز عزيمت ِ نا به هنگامام گزيري نبود
چنين انگاشته بودم.
آيدا فسخ ِ عزيمت ِ جاودانه بود.
ميان ِ آفتابهاي ِ هميشه
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زيبائيي ِ تو |
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لنگريست ــ |
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نگاهات |
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شکست ِ ستمگريست ــ |
و چشمانات با من گفتند
که فردا
روز ِ ديگريست.
چه قدر بند آخر زيبا و دلنشين و عاشقانه و شخصيه! من عاشقشم.
